उपच्छाया ग्रहण वास्तव में चंद्र ग्रहण नहीं होता प्रत्येक चंद्रग्रहण के घटित होने से पहले चंद्रमा पृथ्वी की उपच्छाया में  प्रवेश करता है जिसे चन्द्र मालिन्य कहा जाता है उसके बाद ही वह पृथ्वी की वास्तविक छाया में प्रवेश करता है तभी उसे वास्तविक ग्रहण कहा जाता है भूभाग में चंद्रमा के संक्रमण काल को चंद्रग्रहण कहा जाता है|
ध्यान रहे कई बार पूर्णिमा को चंद्रमा उपच्छाया में प्रवेश कर उपच्छया शंकु से ही बाहर निकल जाता है| इस उपच्छाया के समय चंद्रमा का बिम्ब केवल धुंधला पड़ता है काला नहीं होता तथा इस धुंधलेपन को साधारण नंगी आंख से देख पाना संभव नहीं होता|  धर्मशास्त्रकारों ने इस प्रकार के उप ग्रहणों (उपच्छाया) में चन्द्र बिंब पर मालिन्य मात्र छाया आने के कारण उन्हें ग्रहण की कोटी में नहीं रखा| प्रत्येक चंद्रग्रहण घटित होने से पहले तथा बाद में भी चंद्रमा को पृथ्वी की इस उपच्छाया में से गुजरना पड़ता है जिसे ग्रहण की संज्ञा नहीं दी जा सकती|
वास्तव में उपच्छाया ग्राहणों में ना तो अन्य वास्तविक ग्रहणों की भांति पृथ्वी पर उनकी काली छाया पड़ती है ना ही सौरपिण्डों (सूर्य चन्द्र) की भांति उनका वर्ण काला होता है केवल चंद्रमा की आवृत्ति थोड़ी धुंधली सी हो जाती हैं| अतः धर्मनिष्ठ एवं श्रद्धालु जनों को इन्हें ग्रहण कोठी में न मानते हुए एवं ग्रहण सम्बन्धी पथ्य अपथ्य का विचार ना करते हुए पूर्णिमा सम्बन्धित साधारण व्रत, उपवास, दान आदि का अनुष्ठान करना चाहिए|

इस बात का ध्यान रहे कि यह उपच्छाया ग्रहण वास्तव में चंद्रग्रहण नहीं होता इस उपच्छाया ग्रहण की समय अवधि में चंद्रमा की चाँदनी में केवल कुछ धुंधलापन आ जाता है इस उपच्छाया ग्रहण के सूतक स्नान दान आदि महात्म्य का विचार भी नहीं होगा|

5 जुलाई 2020 रविवार भारत में यह उपच्छया दृष्टिगोचर नहीं होगी| यह उपच्छाया दक्षिण- पश्चिम यूरोप (स्पेन, पुर्तगाल, इटली, फ्रास, इंग्लैंड, आयरलैंड, बेल्जियम, मध्य दक्षिण जर्मनी, हालैण्ड आदि) अधिकतर अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका, अधिकतर उत्तरी अमेरिका, प्रशान्त, एटलांटिक तथा हिंद महासागर में दिखेगी

भारतीय स्टैंडर्ड टाइम स्पर्शादिकाल इस प्रकार हैं-
उपच्छाया चंद्रग्रहण स्पर्श- 8:37 AM
उपच्छाया चंद्रग्रहण मध्य- 10:00 AM
उपच्छाया चंद्रग्रहण मोक्ष- 11:22 AM

इस उपच्छाया चन्द्र ग्रहण के सूतकादि, ग्रहण सम्बन्धी धार्मिक कृत्यों का विचार नहीं होगा|
इस उपच्छाया ग्रहण के स्नान, सूतक आदि का विचार नहीं होगा| पूर्णिमा संबंधी सभी धार्मिक कृत्य जैसे- व्रत, उपवास, दान, सत्यनारायण व्रत पूजन आदि तो निसंकोच होकर करने ही चाहिए|

ध्यान रहे भारतीय ज्योतिष के प्राचीन प्रमाणिक ग्रंथों में भी इस उपच्छाया या धुंधलेपन का धार्मिक महत्व नहीं बतलाया गया है| उपच्छाया ग्रहण में ना तो अन्य पूर्ण अथवा खंडग्रास ग्रहणों की भान्ति पृथ्वी पर उनकी काली छाया पड़ती है और ना ही सौरपिण्डों (सूर्य- चन्द्र) की भान्ति उनका वर्णन काला होता है केवल चंद्रमा की आकृति में उसका प्रकाश कुछ धुंधला सा हो जाता है|